काश! की दुनिया खत्म हो जाती
न तुम बाकी, न हम बाकी
न अजान, ना झीलमिल दिया-बाती
ना पैमाना, ना फिर साकी
कोई लिखता, ना कोई गाता यहाँ
गैर का घर कोई जलाता न यहाँ
फिर सरे-रह न लुटती इज्ज़त
गुल न होती गुल से चमन की जीनत
उफ़! ये भी एक ख्वाब है.. जो बेजा है
होंठ खामोश दिल परेशां है
ये दुनिया न जाने, फिर क्या से क्या हो ..!
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या हो..?
-(दुनिया के महफूज़ होने के बाद और नए साल के पहले)
न तुम बाकी, न हम बाकी
न अजान, ना झीलमिल दिया-बाती
ना पैमाना, ना फिर साकी
कोई लिखता, ना कोई गाता यहाँ
गैर का घर कोई जलाता न यहाँ
फिर सरे-रह न लुटती इज्ज़त
गुल न होती गुल से चमन की जीनत
उफ़! ये भी एक ख्वाब है.. जो बेजा है
होंठ खामोश दिल परेशां है
ये दुनिया न जाने, फिर क्या से क्या हो ..!
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या हो..?
-(दुनिया के महफूज़ होने के बाद और नए साल के पहले)
