Wednesday, January 9, 2013

काश! की दुनिया खत्म हो जाती 
न तुम बाकी, न हम बाकी 
न अजान, ना झीलमिल दिया-बाती 
ना पैमाना, ना फिर साकी 

कोई लिखता, ना कोई गाता यहाँ
गैर का घर कोई जलाता न यहाँ 
फिर सरे-रह न लुटती इज्ज़त 
गुल न होती गुल से चमन की जीनत 

उफ़! ये भी एक ख्वाब है.. जो बेजा है
होंठ खामोश दिल परेशां है

ये दुनिया न जाने, फिर क्या से क्या हो ..!
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या हो..?

-(दुनिया के महफूज़ होने के बाद और नए साल के पहले)

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